मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास चाक ने...../डॉ. रंजन ज़ैदी

मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास चाक ने बंद कमरों की खोई चाबियाँ बरामद करवा दी

जानी-मानी कथाकार मैत्रेयी पुष्पा हिंदी साहित्य का एक सशक्त हस्ताक्षर हैं. किसी समय उनके उपन्यास इदन्नमम् को मैं आकाशवाणी दिल्ली के नाट्य-एकांश के लिए इसका रूपांतरण करना चाहता था लेकिन अनुमति लेने के लिए मेरा उनसे संपर्क नहीं हो सका. चूंकि वह एक सिलसिला था और टाइम-बाउंडेड था, इसलिए मुझे श्रीमती चित्रा मुद्गल की कहानी को लेना पड़ा हालांकि उनकी कहानी पर मैं पहले से ही अलग से काम कर रहा था.
यह महज़ इत्तेफ़ाक़ था कि हम दिल्ली में रहते हुए भी परस्पर एक-दूसरे से नहीं मिल सके. लेकिन मैं एक सुधी पाठक के रूप में उनकी रचनाओं को निरंतर पढता रहता था और मैं उनका प्रशंसक भी था. जब स्वर्गीय राजेंद्र यादव ने उन्हें मरी हुई गाय कहा था तो मुझे बहुत अटपटा सा लगा था. लेकिन यह ज़रूर सोचता था कि राजेंद्र यादव ने ऐसे शब्द अकारण नहीं कहे होंगे।
हिंदी कथाकार हरीश चंद्र बर्नवाल के एक कार्यक्रम में जब मेरी उनसे मुलाक़ात हुई तो मैनें उनके सामने अपना पक्ष रखा. उन्होंने पूछा, 'मेरे शब्दों से क्या तुम्हें तिरस्कार लगता है…शायद तुम हाँ नहीं कहोगे. देखो, वह साधारण कथाकार नहीं है. वह एक ऐसी महिला लेखिका है, जो स्त्री को पहली बार गांव में लेकर आई।' लेकिन उन्होंने यह भी कहा, औरतों के पास उनकी देह है वार्ना योग्यता के नाम पर उनके पास रखा ही क्या है.’     
तब मुझे मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास चाक के एक पात्र का जवाब याद आया,  ‘मेरे पास था ही क्या, हरी भरी देह.’
बात में दम था. गांव की स्त्री और स्त्री के गांव में फर्क तो होता है। तीन-चार दशक पहले गाँवों की महिलाएं 'गावों की बहू, सास, ननद, चाची और मौसी के रूप में हुआ थी, लेकिन जब बेटियां दंगल और उड़ान में उतरीं, आईएस बहू गाँव की ससुराल पहुंची, तब गाँव उनके नाम से पहचाना गया. वह घर से पंचायत पहुंची, पंचायत से प्रदेश की विधायिका में, वहां से लोकसभा में.
ऐसे फैसले गाँव की स्त्री ले रही थी. यह सब एक दिन में नहीं बदला, 40-50 वर्षों के बाद ऐसी स्थिति फ्रेम में पाई. मैत्रेयी पुष्पा सिकुर्रा गाँव में जन्मी है, बुंदेलखंड में पली-बढ़ी, दिल्ली में आकर रची-बसी, तभी उन की कहानी फैसला की बसुमती सर उठाकर अपने निर्णय लेने में पूरे आत्मविश्वास के साथ सक्षम हो सकी।
गाँव की बेटियां बदल रही हैं. मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास इसी सच्चाई की तर्जुमानी करते दिखाई देते हैं. अल्मा कबूतरी, इदन्नमम्, चाक, में जो गाँव हैं, वे बदलते समय के केनवास हैं, भावी भारत का परिदृश्य हैं. उनमें बेटियां भी जींस पहनकर स्कूल-कालेज जाती दिखाई देती हैं, साइंस की लैब में परीक्षण भी करती हैं, पुलिस प्रशासन और सेना में जाने का हौसला भी रखती हैं.
मुझे याद है, एक इंटरव्यू में मैत्रेयी पुष्पा ने एक सवाल के जवाब में कहा था, कुछ लोगो ने इदन्नमम्, ‘चाक’, ‘अल्मा कबूतरीजैसे उपन्यासों को स्त्री की स्वाधीनता के लिए साहसपूर्ण कदम के रूप में देखा। जब पुरस्कारों की बात आती है तो मुझे ताज्जुब हुआ कि साहित्य अकादमी के लिए उन रचनाओं की लाइन में मेरी वे स्त्रियां भी हैं जिन्होंने यहां तक सफर किया था। वे हर साल लाइन में रहीं पर जब नतीजे आए तो मुझे पता चला कि उन्हें हर बार ढकेल दिया गया। मैं अपने लिए प्रोत्साहन नहीं चाहती थी किंतु मेरे मन में उन वंचित और संघर्षशील स्त्रियों के लिए प्रोत्साहन की भावना जरूर थी इसलिए मुझे ठेस लगी।*
मतलब साफ़ है कि प्रगतिशीलता का चित्रण कोरी मिथ्या नहीं है. उसका आक्रामक यथार्थवाद नए परिवर्तन की संभावनाओं की निशानदेही करता है. इदन्नमम् या चाक के समाज में बदलाव नज़र भी रहा है. तो क्या हम मानकर चलें कि आज की स्त्रियां वास्तव में इतनी बदल चुकी हैं? क्या वास्तव में महिलाओं में इतनी निर्भीकता चुकी है, हम जाट स्त्रियां बिछुआ अपनी जेब में रखती हैं. जब चाहती हैं पहन लेती हैं, जब चाहती हैं उतारकर जेब में रख लेती हैं.*
गाँव के दलित, शोषित या उपेक्षित समाज और अगड़ी जातियों के समाज के बीच सामूहिक संघर्ष अब राजनीतिक सघर्ष में बदलने लगा है. इस संघर्ष में स्त्री तनहा नहीं है. वह अपने दलित पिछड़े समाज के मानसी-कन्धों के साथ आगे बढ़ रही है. गाँव की नारी सारंग* आंचलिकता के परिदृश्य में जब अपने निजी संघर्ष को सामाजिक संघर्ष में विलय करती है तो अगड़े समाज की पिछड़ी स्त्री आत्माभिमान से सीना चौड़ाकर सामंती समाज के पुरोधाओं के सामने खड़ी होती है.
मैत्रेयी पुष्पा के पात्रों की आवाज़ भले ही देर से आई हो, लेकिन आई ज़रूर और उस आवाज़ से पुरुष समाज तिलमिला भी गया. कुछ लोग लेखक की सोच को ही छिनाल कहने लगे. लेकिन जब स्त्री मर्द के तहबंद को उघाड़कर खुद उसका शर्म बनजाती है तो पॉश समाज की कितनी ही हरमसराओं के आईने अपने आप तड़क जाते हैं.
ज्यादा ही सरमदार का घुसला बन रहा था. तहमद ऊपर को सरकावै ही . लत्ता जितना ही ऊपर उठाऊँ, उतना ही भींचता जाये तैमद को. मैंने कही रे लुगाई है तू? जबरदस्ती तैमद खोलकर फ़ेंक दिया बंजमारे का. मैंने ऐसी मालिश करी जैसे छः महीने का बालक हो और फिर खाट पर लोट गई उसके बरब्बर में. बोल दिया कि लल्लू कैलासी, भूल जाओ रिश्ते नाते, और फिर यह तो देह रहते के खेला है..... पाप पुन्न मत सोचना.* उपन्यास की सारंग हो या उसकी कलावती चाची, यौन शुचिता की शर्तों, मापदंडों और बैसाखियों को तोड़ती हुई अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी इच्छाओं से जीने की महत्वकांक्षा की कालजयी प्रतीक के रूप में जीवित रहेंगीं. शायद इसी के खुलासे ने मैत्रेयी पुष्पा को चाक उपन्यास ने चर्चा की परिधि में ला खड़ा किया था.
अल्मा कबूतरी एक नए इंक़लाब का प्रतीक बनने के लिए आतुर है? मैत्रेयी पुष्पा लिखती हैं जब लिखित या व्यावहारिक तौर पर स्त्री पितृसत्ता के सौतेले और कठोर व्यवहारों पर सीधी नहीं, मरखनी गाय की तरह सींग हिलाने लगती है, यानी मुझे तुम्हारा निजाम मंजूर नहीं। हमारा पुरुष समाज देखता है, अरे यह क्या हुआ, त्यागमयी सहिष्णु नारी, सेवाभावी स्त्री, अपने स्वामी के इशारों पर उठने-बैठने और चलने-फिरने वाली औरत और अपनी दसों इंद्रियों को निग्रह के हवाले रखने वाली सती, आज कैसी उल्टी-सीधी बातें करने लगी है!* यही तो इंक़लाब की दस्तक है………. भला भरत भारद्वाज इसे कैसे समझ पाएंगे ?
_______________________________________________________________________________________________________
* फोर लाइन सड़क, गांव और भौजाइयां, मैत्रेयी पुष्पा,

* उपन्यास 'चाक', -मैत्रेयी पुष्पा
* चाक, पृष्ठ: 104, 329