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बुधवार, 11 मार्च 2015

'लाल किताब' की संदिग्ध प्रामाणिकता /ऑस्ट्रो-टॉक

लाल किताब' की मूल पाण्डुलिपि के बारे में कहा जाता है कि वह अरबी से फ़ारसी में अनूदित की गई थी. उर्दू में उसका अनुवाद सबसे पहले 1946 में मौलाना अब्दुल साजिद नोमानी नक़्शबन्दी ने किया था जो भारत-पाक विभाजन के समय ईरान जाकर बस गए थे.
      कमाल की बात यह है कि इसके असली नुस्खे एक साथ अभी तक बरामद नहीं हो सके हैं. हालांकि खोजबीन अभी भी जारी है. कहा तो यह भी जाता है कि असली नुस्खों की तलाश में अमेरिका के कुछ ज्योतिषी-नुमा जादूगर इसी पुस्तक के नुस्खों की तलाश में कई बार पाकिस्तान (लाहौर तथा पेशावर में)  भी गए लेकिन उन्हें कामियाबी नहीं मिली.  
      इसके बावजूद 1952  में पाकिस्तानी मूल के विस्थापित पंडित आनंद मोहन सेखड़ी ने लाहौर प्रेस के समय के मशीनमैन लाला जगत नारायण सहजवाल की मदद से इस पुस्तक की कथित उपलब्ध पाण्डुलिपि का प्रकाशन किया गया जिसमें असंख्य त्रुटियाँ पाई गईं. फिर भी व्यावसायिक ज्योतिषियों ने इस पुस्तक को अपने लिए आधार-संहिता मानकर इसमें अनेक सुधार करवाये और इसे 'लाल किताब' बताकर इसका प्रकाशन कर दिया. डॉ
      यही नहीं बल्कि वैश्विक बाजार में इस पुस्तक के अनेक अनूदित संस्करण भी लाये गए लेकिन ईरान, इंग्लैण्ड और अमेरिका के नामचीन ज्योतिषियों ने इस पुस्तक की सत्यता पर अनेक सवाल खड़े कर दिए. फिर भी उन सवालों को भारत में  गंभीरता से नहीं लिया गया. यही कारण है कि लाल किताब की सत्यता संदिग्ध होते हुए भी आजतक भारतीय व्यवसायिक ज्योतिषियों का मार्गदर्शन करती आ रही है.
      इस ब्लॉग के माध्यम से हमारा प्रयास यह रहेगा की हम ज्योतिष की बारीकियों से आपका परिचय कराएं और इसके माध्यम से आप अपनी सोच को वैज्ञानिक मानकों पर परखकर जीवन को बेहतर दिशा दें.