नौबत राय यानि प्रेमचंद. हिंदी-उर्दू साहित्य के आकाश का न बुझने वाला एक ऐसा सितारा जो साहित्याकाश में हमेशा जगमगाता रहेगा.
प्रेमचंद की दैहिक रूप से मृत्यु अक्तूबर 8,1936 में हुई थी किन्तु कथाकार प्रेमचंद तो आज भी जीवित है. दार्शनिक दृष्टि से देखें तो कहेंगे कि देह और कर्म में अंतर होता है.वैयक्तिक देह नश्वर है,उसके कर्म जीवित रहते हैं. कर्म के दर्शन को मानें तो आज भी हम प्रेमचंद के उपन्यासों (सेवासदन से लेकर मंगलसूत्र तक) को अपनी स्मृति के वाचनालय में सहेजे हुए हैं.
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी* की भूमिका प्रेमचंद के जीवन में अविस्मरणीय है क्योंकि वह उनकी रचनाओं का एक ऐसा पात्र-पिंड हैं जो अपने विस्फोट से ऐसे पात्रों को जन्म देता रहा जो औपन्यासिक फलक पर फैलकर कालजयी हो गए. वे भूमिकाएं जो पात्रों के रूप में शांता, सुमन निर्मला, मनोरमा, सोफिया, सकीना, धनिया और मालती के नामों के साथ उपन्यासों में निभाते हुए किसी न किसी तरह से जीवित रहीं, वे समय और काल के गर्भ में जीवंत हो गयीं. जब-जब उनका पुनर्जीवन हुआ तब-तब वे अंकुरित हुईं, सामाजिक परिवेश में अपनी-अपनी भूमिकायें निभाने में सक्रिय हो गईं. प्रेमचंद के लेखन की यही सबसे बड़ी विशेषता है. शिवरानी देवी ने अपने समाज और निजी-जीवन में जो घर निर्मितकर
पति मुंशी प्रेमचंद को दिया था, वही घर पति की साहित्यिक रचनाओं का घर बन गया जिसमें उनके पात्रों में पात्र कृष्ण चन्द्र ने जन्म लिया, अमरकांत और रमाकांत, जालपा वहीं पैदा हुये, गोबर जैसे पात्र की भूमिका को भला कौन भूल सकता है.
उस घर में आध्यात्मिकता के भ्रम का निवास पूर्वत बना हुआ था, किन्तु इस घर की परम्पराएं कबीरपंथी थीं और रचनाएँ तत्कालीन महाजनी साहित्य-धारा से भिन्न थीं. सांस्कृतिक विरासत में भी बदलाव जन्म लेता जा रहा था. जागरण (जनवरी 15, 1934) के सम्पादकीय में प्रेमचंद ने लिखा,'संस्कृति अमीरों का, पेट भरों का, बेफ़िकरों का व्यसन है. ...यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी जो राजा बनकर, जगत-सेठ बनकर जनता को लूटती थी... साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। ..(वह) सिंह की खाल ओढ़कर आती है.*
प्रेमचंद का विचार था कि विश्व की आत्मा के अंतर्गत ही राष्ट्र या देश होता है और इसी आत्मा की प्रतिध्वनि है 'साहित्य'. वह हिन्दू राष्ट्र निर्माण करने के पक्ष में नहीं थे. *
प्रेमचंद के समय में
लिखे गए साहित्य की हिन्दू स्त्रियां बहनें हैं, बीवियां हैं, नंदनें हैं, सासें हैं और मुस्लिम औरतें वेश्याएं हैं, ईसाई कुलटाएँ हैं, बात आगे बढ़ी तो हिंदी के लेखक भी
कालांतर में हिन्दू हो गए, मुस्लिम
पात्रों को अछूत बनाकर
बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. जिन्हें रखा, उन्हें कोठों से उठाया, ईसाइयों
को पतित पात्र बनाकर रख लिया.*
तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक
परिवर्तन के बीच परिस्थितियां बदल रही थीं. इसका ज़िक्र प्रेमचंद ने मुंशी दयाराम निगम को भेजे अपने एक पत्र में किया था,'उर्दू में अब गुज़र नहीं है. यह मालूम होता है कि बालमुकुंद गुप्त मरहूम की तरह मैं भी हिंदी लिखने में ज़िन्दगी सर्फ़ कर दूंगा. उर्दू नवीसी में किस हिन्दू को फैज़ हुआ जो मुझे हो जायेगा. * इसके बावजूद तत्कालीन बदलती विचारधारा ने जब कथाकार प्रेमचंद का क़लम थामा तो हिन्दू,
मुस्लिम पात्रों ने उन्हें घेर लिया और खुशनसीबी यह कि वह अपने पात्रों से कभी दूर नहीं जा सके. उर्दू से उनका रिश्ता कभी टूट नहीं सका. यह था प्रेमचंद को महान बनाने वाला वह जज़्बा जिसने उनके व्यक्तित्व को विशालता के सर्वोच्च
शिखर तक पहुंचाने
में संकोच से काम नहीं लिया.
आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने एक पुस्तक लिखी, 'इस्लाम का विष-वृक्ष'.
प्रेमचंद को पुस्तक पढ़कर बहुत बुरा लगा. जैनेन्द्र को पत्र लिखा,'इन चतुरसेन को क्या हो गया है कि 'इस्लाम का विष-वृक्ष' लिख डाला. उसकी एक आलोचना तुम लिखो और वह पुस्तक भेजो. इस कम्युनल प्रोपेगंडा का ज़ोरों से मुक़ाबला करना होगा और यह ऋषभ भला आदमी भी इन चालों से धन कमाना चाहता है.*
यह सच है कि मुंशी प्रेमचंद पीएन ओक के हिंदुस्तान के समर्थक नहीं थे, वह थे नए जनतंत्र के समर्थक.
उनके साहित्य में हमें ऐसा ही जनतंत्र दिखाई भी देता है. लेकिन क्या तत्कालीन साहित्य के मठाधीश दिग्गज ऐसे हिंदुस्तान की रचना में दिलचस्पी ले रहे थे? हिंदी प्रदीप के मई 1882
के अंक 8 में धुरंधर हिंदी के विद्वान साहित्यकार महावीर प्रसाद द्वेदी लिखते हैं, 'कचहरियों में उर्दू अपना दबदबा जमाये हुए है. अपने सहोदर पुत्र मुसलमानों के सिवा हिन्दू जो उसके सौतेले पुत्र हैं, उन्हें भी ऐसा फंसाये रखा है कि उसी के असंगत प्रेम में बंध ऐसे महानीच निठुर स्वभाव हो गए हैं कि अपनी निजी जननी सकल गुड़ आगरी नागरी की ओर नज़र उठाये भी अब नहीं देखते.'
हिंदी के साहित्यकार श्रीधर पाठक भला कैसे चुप रहते, लिखा, 'हिंदी हिन्दुओं की ज़बान, बेजान. उर्दू से कटाये कान. कमर टूटी हुई, लाठी पुरानी हाथ में, बे मदद, बे आक़ा. मुसीबतज़दा, जगह-जगह मारी फिरती है. शेर कहते हैं,
अफ़सोस सद अफ़सोस कि हिन्दू ये बेशुमार,
उर्दू के बद-फरेब से करते गिला नहीं.
इसपर पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने फड़ाक से एक नारा दिया--
जपौ निरंतर एक जबान,
हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान.
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*शिवरानी देवी की पुस्तक : प्रेमचंद घर में (आत्माराम एंड संस दिल्ली,1956 )
*भारतेन्दु काव्य की हिंदी कविता में जातीयता, सुधा वर्ष 3,पृ। 670 -675
*संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, नीरा पाखंड. इसके जन्मदाता भी वही लोग हैं जो साम्प्रदायिकता की शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं.
* नयी कहानी की भूमिका : कमलेश्वर पृ.22 -23 ,पृ० 46
* प्रेमचंद, चिट्ठी-पत्री , भाग 1, हंस प्रकाशन, इलाहबाद 1962
* प्रेमचंद, चिट्ठी-पत्री , भाग 1, हंस प्रकाशन, इलाहबाद 1962